बीमा आग्रह की विषय वस्तु है !!

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   बीमा (Insurance) आग्रह की विषय वस्तु है, कृप्या नियम और जानकारी विस्तार से पढ़ें। यह पंक्ति (Tag Line) आपने शायद कई बार पढ़ी होगी और कई बार टीवी पर विज्ञापन (Advertisement) में सुनी भी होगी। यह पंक्ति विज्ञापन में इतनी तेजी से पढ़ी जाती है कि आप सुन ही न पायें, दरअसल यह सुनाना बीमा कंपनियों की मजबूरी है परंतु इसमें ज्यादा समय न देकर वे उत्पाद के बारे में बताते हैं और सोचते हैं कि यह पंक्तियाँ तो दर्शक सुन ही लेंगे। अगली बार जब भी आप विज्ञापन देखें तो यह पंक्ति ध्यान से सुनियेगा, आप को समझ भी आ जायेगी।

   हम यहाँ बीमा की बात करेंगे क्योंकि इस पंक्ति से केवल बीमा को बेचने (Marketing) का संबंध है, जब व्यक्ति कोई भी बीमा लेता है तो न ही वो इस बारे में चिंतित होता है कि कौन कौन से जोखिम (Risk) बीमा कंपनियों द्वारा नहीं उठाये जायेंगे और न ही बीमाकर्ता (Insurance Agent) इस बारे में बताते हैं, बीमाकर्ता को इस बारे में जानकारी देना ही चाहिये, जिससे बीमित व्यक्ति (Policy Holder) को अपनी पॉलिसी के बारे में पूरी जानकारी पता रहे। बीमाकर्ता को भी अपने और बीमा कंपनी के दायित्व का पता होना चाहिये। इन नियमों (Rules) में साफ साफ (Clearly) लिखा होता है कि क्या क्या जोखिम बीमा कंपनी नहीं उठायेगी।

   वैसे आपकी जानकारी के लिये बता दिया जाये कि बीमा अधिनियम 1938 की धारा 41 और 45 मुख्यत: (Main) होती हैं जो कि इस पंक्ति बीमा आग्रह की विषय वस्तु से संबंधित होती हैं।

बीमा अधिनियम विस्तार में  –

   बीमा अधिनियम 1938 की धारा 41 के अनुसार: कोई व्यक्ति भारत (India) में जीवन या संपत्ति से संबंधित किसी भी प्रकार के जोखिम के संबंध में बीमा करवाने या उसका नवीकरण करवाने या उसे जारी रखने के लिए किसी भी व्यक्ति को, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, प्रलोभन (attraction) के रूप में देय कमीशन (paid commission) पर पूर्णतः या अंशतः कोई छूट या पॉलिसी में प्रदर्शित प्रीमियम पर कोई छूट अनुमत नहीं करेगा या अनुमत करने की पेशकश ही करेगा, ना ही बीमा करवाने, उसका नवीकरण (renewal) या जारी रखने वाला कोई व्यक्ति, बीमाकर्ता की प्रकाशित विवरण-पुस्तिका या तालिका के अनुसार अनुमत छूट के अलावा, किसी भी प्रकार की छूट स्वीकार करेगा।

बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 45: “इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले प्रभावी किसी जीवन बीमा पॉलिसी पर, इस अधिनियम के प्रारंभ दिनांक से दो वर्षों के समापन के बाद, और इस अधिनियम के प्रचलित होने के बाद प्रभावी किसी भी जीवन बीमा पॉलिसी पर, उसके प्रभावी होने के दिनांक से दो वर्षों के समापन के बाद बीमाकर्ता द्वारा इस आधार पर सवाल उठाया जाएगा कि प्रस्ताव में या किसी रिपोर्ट में या पॉलिसी जारी करने के लिए प्रयुक्त किसी दस्तावेज़ (Documents) में किसी चिकित्सा अधिकारी (Doctor), या रेफ़री, या बीमाकृत व्यक्ति के किसी दोस्त द्वारा किया गया कोई कथन ग़लत या झूठा था, बशर्ते कि बीमाकृत व्यक्ति (Policy Holder) यह दर्शाता है कि ऐसा कथन महत्वपूर्ण सामग्री या छिपाए गए तथ्यों (Facts) पर आधारित था और उनका प्रकटीकरण महत्वपूर्ण है और पॉलिसी धारक द्वारा कपटपूर्ण ढंग से किया गया है और ऐसा करते समय पॉलिसी धारक को ज्ञात था कि कथन झूठा है या तथ्यों को छिपाता है जिनका प्रकटीकरण महत्वपूर्ण है।

   बशर्ते कि इस खंड में शामिल कोई भी बात बीमाकर्ता (Insurance Agent) को किसी भी समय उम्र का प्रमाण माँगने से नहीं रोकेगी, यदि वह ऐसा करने के लिए हकदार है, और ना ही किसी भी पॉलिसी पर सिर्फ़ इस वजह से सवाल उठाया जाएगा कि प्रस्ताव में ग़लत रूप से कथित पॉलिसी की शर्तों को बीमाकृत व्यक्ति के बाद में प्राप्त उम्र संबंधी प्रमाण के फलस्वरूप सुधारा गया है”।

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