भारत की वित्तीय एवं निवेश उद्योग को समझें – मुद्रा, वित्तीय परिसंपत्तियाँ, प्रतिभूतियाँ Indian Financial and Investment Industry Money

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Basic Concept – वित्तीय तंत्र बाजार और संस्थाओं का जाल होता है, जो कि अर्थव्यवस्था में धन को सभी विभागों तक पहुँचाते हैं। विभिन्न विभागों में धन संचार कई तरीकों से होता है जैसे मुद्रा (Money), वित्तीय पूँजी, प्रतिभूतियाँ (डेब्ट, इक्विटी)। सबसे पहले हम इन बुनियादी बातों को समझते हैं, जो कि हमें इस वित्तीय तंत्र को समझने में मदद करेगा।

मुद्रा (Money) – मुद्रा कोई भी वस्तु हो सकती है जो कि किसी वस्तु की कीमत के रूप में स्वीकृत हो, और डेब्ट या किसी वस्तु को खरीदने एवं सेवाओं के बदले दी जा सके। मुद्रा वह माध्यम है जो कि सर्वस्वीकृत होती है और जिससे वस्तु या सेवाओं की कीमत चुकायी जा सके। मुद्रा के प्रचलन के पहले कई चीजों की कीमत तय कर, उनका ही आपस में लेनदेन होता था। अब सरकार द्वारा हर देश में धातु और कागज की मुद्रा का प्रचलन होता है, जो कि हर जगह मान्य होती है। जरूरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा के बदले में हम अपने देश की मुद्रा भी प्राप्त कर सकते हैं और वैसे ही अपनी मुद्रा से हम विदेशी मुद्रा भी ले सकते हैं। जब हम मुद्रा विनिमय करते हैं तो सभी मुद्राओं की अपनी एक कीमत होती है, जो कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तय होती है।

वैध मुद्रा (सिक्के और नोट) जनता के द्वारा धन लेन देन के लिये अधिकतर उपयोग में लाये जाते हैं। अब यह प्लास्टिक मनी याने कि धन (डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड,स्मार्ट कार्ड) और इलेक्ट्रॉनिक मनी, वैलेट में तेजी से बदलते जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मनी को हम एकदम ट्रांसफर कर सकते हैं, जिससे कि धन कहीं भी भेजा जा सकता है और तुरंत ही कहीं और धन के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

धन के अवधारणा में विभिन्न तरह की वित्तीय परिसंपत्तियाँ (Financial Assets) भी होती हैं।

वित्तीय परिसंपत्तियाँ (Financial Assets) –

वित्तीय परिसंपत्तियाँ (Financial Assets) एक दस्तावेज या सर्टिफिकेट ऑफ टाइटल या डिपॉजिटरी एकाऊँट का स्टेटमेंट होती हैं, जो कि भौतिक संपत्तियों को दर्शाती हैं। उदाहरण – सावधि जमा रकम सर्टिफिकेट (Fixed Deposit Receipt)  जिसमें कि बैंक की देनदारी है कि निश्चित समय के बाद निश्चित किये गये ब्याज की दर से रकम को वापिस करने की ।

मुद्रा (नोट और सिक्के) वित्तीय परिसंपत्तियों के सबसे तरल प्रकार होते हैं। जबकि लंबी अवधि के ऋण जो कि कंपनी द्वारा लिये जाते हैं वे तरल नहीं होते हैं। तरलता का मतलब है कि कितनी आसानी कम से कम समय में कम या अधिक मुद्रा को बाजार में कम या बिना कीमत अदा किये चलाया जा सके।

प्रतिभूतियाँ –

प्रतिभूतियाँ प्रमाणी दस्तावेज होते हैं जो कि वित्तीय परिसंपत्तियों के स्वामित्व के बारे में बताता है। भारत में प्रतिभूतियों को Securities Contracts (Regulation) Act, 1956 में परिभाषित किया गया है –

  1. शेयर्स, स्क्रिप्स, स्टॉक्स, बॉन्ड्स, डिबेन्चर्स, डिबेन्चर्स स्टॉक या अन्य बाजार में उपलब्ध प्रतिभूतियाँ।
  2. डेरिवेटिव
  3. यूनिट
  4. सरकारी प्रतिभूतियाँ
  5. अन्य कोई वित्तीय उतपाद जो कि सरकार द्वारा प्रतिभूति घोषित किये गये हों।
  6. राइट्स या इन्टरेस्ट इन सिक्योरिटिज

यहाँ हम प्रतिभूति का मुख्य विशेषता देख सकते हैं कि प्रतिभूति को बेचा, खरीदा जा सकता है, बदला जा सकता है या केवल बेचा भी जा सकता है। प्रतिभूति पर मिलने वाले लाभ उनके प्रकार पर निर्भर करता है, जैसे कि डेब्ट या इक्विटी

डेब्ट (Debt) – यह एक उधारकर्ता का प्रतिज्ञापत्र या इकरारनामा होता है कि निर्धारित रकम निर्धारित समय के बाद जमाकर्ता को दे दी जायेगी। इस प्रतिज्ञापत्र या इकरारनामे में रिपेमेन्ट, ऋण की शर्तें, ब्याज दर और उसमें किन प्रतिभूतियों को बंधित किया गया है, लिखा होता है। इसमें अन्य नियम व शर्तें भी होती हैं कि अगर उधारकर्ता समय से रकम न चुका पाया तो बंधक प्रतिभूतियों का कैसे निपटारा किया जायेगा।

इक्विटी (Equity) – इक्विटी याने कि स्वामित्व। वित्तीय बाजारों के प्रारूप में समझने की कोशिश करें तो इक्विटी मतलब कि शेयर कहलाता है। जब शेयर खरीदा जाता है, इसका मतलब यह होता है कि आपने किसी कंपनी का कुछ भाग करीद लिया है और कंपनी आपको शेयर इश्यू करेगी। जब कंपनी को लाभ होगा तो कंपनी आपको लाभांश जारी करेगा, और शेयर की कीमत बाजार में कम या ज्यादा होती रहेगी।

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